अगर संविधान ग्राम केंद्रित होता तो कम से कम आज जैसे दृश्य नहीं दिखते..



गांधी संविधान को ग्राम केंद्रित बनाना चाहते थे। जब आजादी नजदीक थी, एक जुलाई 1947 को यंग इंडिया के अंक में उन्होंने भावी संविधान और उसमें गांवों की स्थिति को लेकर बाकायदा अपने विचार जाहिर किए थे..
फिर जो संविधान आया, वह गांव केंद्रित नहीं रहा…
इसका हश्र जो हुआ, वह तो आजादी के बाद से ही दिखता रहा है..कोरोना संकट के बाद कुछ ज्यादा ही दिख रहा है..
सोचिए, अगर गांव केंद्रित संविधान होता..तो अचानक आई अखिल भारतीय तालाबंदी के दौरान अपना बोरा-झोरा सिर-कंधे पर लादे गांधी के दरिद्र नारायणों के पैदल ही अपने घरों की ओर लौटने के राजमार्गीय नजारे दिखते…
निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में होता..
ग्राम केंद्रित संविधान और व्यवस्था तैयार करने के विचार को हमने तिलांजलि तो आजादी हासिल होने की संभावना देखते ही दे दी..
जिन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को हम संविधान निर्माता मानकर सम्मान देते हैं, दरअसल वे ही नहीं चाहते थे कि संविधान ग्राम केंद्रित हो…
गांवों को लेकर उनकी सोच ठीक नहीं थी..
ऐसा नहीं कि संविधान सभा में संविधान को ग्राम केंद्रित बनाने की मांग नहीं उठी..
चूंकि संविधान सभा में गांधीवादी भी चुनकर खूब आए थे, लिहाजा उन्होंने संविधान में व्यक्ति को इकाई मानने की बजाय गांव को मानने की मांग रखी..
लेकिन डॉक्टर अंबेडकर ने इसे खारिज कर दिया..
अपने भाषण में उन्होंने गांवों को लेकर जो राय जाहिर की थी, वह आप भी देखिए..
अंबेडकर ने कहा था, ग्राम पंचायतों ने इस देश का नाश ही किया है। हमारे देहात और हमारी पंचायतें स्थानिक अहंकारों की गंदगी से युक्त, अज्ञान की गुफा, संकुचितता और जातिवाद के प्रतीक बन गए हैं। ऐसी पंचायतों को इकाई कैसे बना सकते हैं?
यह दुखद ही नहीं, हैरतअंगेज भी है कि अंबेडकर गांव केंद्रित हजारों हजार साल की भारतीय व्यवस्था के नैरंतर्यता और उसकी ताकत को नहीं देख सके..
वे समझ नहीं पाए कि जिस वसुधैव कुटुंबमक की अवधारणा को हम दुनियाभर को बता कर खुद को श्रेष्ठ दिखाते हैं, उसके मूल में ग्राम केंद्रित व्यवस्था ही थी..
हमारे आदिवासी भाइयों के गांवों में यह व्यवस्था आज भी देखी जा सकती है..
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि अंबेडकर भावी भारत में नगरीय व्यवस्था के वर्चस्व के बहाने नागर समाज के उन व्यक्तियों के वर्चस्व की भावी व्यवस्था को नहीं समझ पाए, जो आज दिख रही है…
क्या यह सच नहीं है कि आज का हमारा पूरा चिंतन, हमारी व्यवस्था, हमारी नीतियां नागर समाज केंद्रित हैं?
इसका असर यह हुआ कि संविधान ग्राम केंद्रित की बजाय व्यक्ति केंद्रित अवधारणा के तहत बना..
लेकिन दुर्भाग्य देखिए..अमेरिकी या यूरोपीय देशों के संविधान के मुताबिक
राज्य की मूल इकाई व्यक्ति को भी वह सम्मान नहीं मिला, जो एक मनुष्य को मिलना चाहिए..
आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक ताकत पर व्यक्ति का सम्मान और अधिकार निर्भर करने लगा..
हमारी व्यवस्था ने इसे ही स्वीकार कर लिया..
कहने को हमारे संविधान के मुताबिक हर व्यक्ति को, चाहे वह ताकतवर हो या कमजोर, आर्थिक रूप से मजबूत हो या गरीब, उद्योगपति हो या मजदर, कानून और व्यवस्था के सामने सब बराबर हैं..
लेकिन क्या हकीकत में ऐसा हो पाता है..
क्या सबको एक ही समान हेल्थ सुविधा मिलती है..
क्या सबके लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे आधी रात को खुलते हैं
सवाल यह उठ सकता है कि अगर ग्राम केंद्रित व्यवस्था होती तो क्या इस सोच में बदलाव होता..
निश्चित तौर पर बदलाव होता..
कम से कम ग्राम केंद्रित नीतियां बनतीं..
गांवों को आत्म निर्भर बनाना संवैधानिक जिम्मेदारी होती
इसका असर यह होता कि जनसंख्या विकेंद्रीकृत होती
अपवाद छोड़ दें..तो ग्रामीण संरचना ऐसी रही है, जहां व्यक्ति का सम्मान मौजूदा व्यवस्था की तुलना में कहीं ज्यादा रहा है
अगर संविधान ग्राम केंद्रित होता तो महज पेट भरने के लिए जनसंख्या का पलायन नहीं होता
तब हारी-विपत्ति में कम से कम आज जैसे दृश्य नहीं दिखते..

( लेखक उमेश चतुर्वेदी Delhi Journalists Association में उपाध्यक्ष हैं )

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