मैं अयोध्या को छोड़ आया हूँ या खुद को अयोध्या में छोड़ आया हूं..


16 दिन लगातार एक शहर को जीते हुए आप खुद में एक चलता-फिरता शहर हो जाते हैं। अपनी पीठ पर यादों के मोहल्लों को उठाये हुए। अपने कंधों पर स्मृतियों की नर्सरी उगाए हुए। अपनी आंखों में सरजू के किनारे रात भर जले दिए का काजल लगाए हुए। मालूम नही पड़ता कि हुआ क्या है? […]