पन्ना, पर्चा, पदाधिकारी, सब धरे के धरे रह जाते हैं, जब आप जनता को समझने में गलती करते हैं..

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दिल्ली चुनावों में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत बहुत कुछ कहती है. अव्वल तो ये कि लाव-लश्कर, ताव-तैश, तंज़-तेवर और लगातार नकारात्मक प्रचार जनता को नहीं पचता. सांप्रदायिकता को राजनीति का मूल चरित्र बना देना नहीं चलता. नहीं चलता कि जब कोई अपने काम का बार-बार जिक्र करता हो, लोग उसकी चर्चा करते हों औऱ आप सबकुछ खारिज करते चलें. नतीजा सामने है और इसके संदेश भी. यह चुनाव खासतौर पर अमित शाह के लिये सबक है. पन्ना, पर्चा, पदाधिकारी, सब धरे के धरे रह जाते हैं, जब आप जनता को समझने में गलती करते हैं. जब आप यह नहीं समझ पाते कि चुनाव किस तरह की जनता के बीच लड़ा जा रहा है और आप कौन-सा रास्ता अपना रहे हैं. अमित शाह ने यही चूक की.
अमित शाह को शायद यह लग रहा था कि हर बार हिसाब-किताब वाला मामला चल जाता है. लेकिन ऐसा है नहीं. दिल्ली का चरित्र बिहार औऱ यूपी जैसे राज्यों का चरित्र नहीं है. एक सिरे पर तुर्रा छोड़ो तो दूसरे सिरे पर वह लोगों को तुर्रम खां बना देता है. अलबत्ता यह छोटा राज्य है. एक हिस्से का सच दूसरे हिस्से को पता रहता है.लोग आपस में बोलते-बतियाते रहते हैं. और यहां पढे-लिखे समझदार लोग ज्यादा है. लिहाजा, वह फार्मूला नहीं चल सकता जिसको आपने अबतक कामयाब माना था.
मोदी फैक्टर, 370, ट्रिपल तलाक, अयोध्या मंदिर जैसे मुद्दे काम करेंगे लेकिन दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिये नहीं. बल्कि ये सारे साहसिक फैसले उस वक्त कारगर हथियार के तौर पर काम करेंगे जब नरेंद्र मोदी अपनी सरकार के लिये लोगों के बीच आएंगे. मगर मामला दिल्ली का था और अरविंद केजरीवाल लोगों से ये कह रहे थे कि मैं रोड बनाना चाहता हूं- ये कहते हैं इसको हटाओ, मैं स्कूल-अस्पताल बनाना चाहता हूं- ये कहते हैं इसको हटाओ, मैं अपनी दिल्ली की सेवा करना चाहता हूं और ये कहते हैं कि इसको हटाओ. यह एक अलग रणनीति थी जिसमें कोई आक्रामकता, नकारात्मकता और अभद्रता नहीं थी. इसका जवाब अलग होना चाहिए था लेकिन बीजेपी का अड़ियलपन ऐसा कि बिहार यूपी या फिर बंगाल वाला चुनावी फार्मूला दिल्ली में भी पूरी ताकत से आजमाने लगी. समूची ताकत सड़कों पर उतार दी.
प्रधानमंत्री की दो-दो रैलियां, अमित शाह के 35 रोड शो, 45 रैलियां, बीजेपी के सारे मुख्यमंत्री-पूर्व मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, नेता-कार्यकर्ता, संघ के पदाधिकारी, स्वयंसेवक- सब दांव पर लगा दिया, लेकिन सब खेत रहे. सही मायने में देखिए तो कोई फायदा नहीं हुआ.
चुनाव के लिए अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल-डेढ साल से तैयारी शुरु कर दी थी. बिजली-पानी पर रियायत से उन्होंने लोगों की बड़ी आबादी को पहले अपनी ओर खींचा, इसके बाद मोहल्ला क्लीनिक जो लगातार सवालों में आ रहे थे, उनकी हालत ठीक करवाई, चुनावों से कुछ महीने पहले महिलाओं के लिये टीटीसी बस में मुफ्त का सफर कर दिया और स्कूलों की हालत बेहतर हुई इसके प्रचार प्रसार पर काफी काम किया. स्कूलों के बारे में लोग ये कहते मिले कि सरकारी स्कूलों की हालत तो ठीक हुई ही है, प्राइवेट स्कूलों की फीस भी नहीं बढी है. इससे मध्यमवर्ग भी केजरीवाल सरकार का मुरीद हुआ. दूसरी स्थिति पड़ोसी राज्य हरियाणा और यूपी की थी, जहां बीजेपी की सरकारें हैं. इन दोनों राज्यों में बिजली की दरें बढीं और स्कूलों की फीस बेलगाम रही.
सबसे बड़ी बात ये कि दिल्ली के जो रेहड़ी पटरी वाले हैं, वो केजरीवाल सरकार में पुलिस की वसूली और हफ्ताउगाही के पुराने शिकंजे से मुक्त हो गए. इससे उन्हें काफी राहत महसूस हुई और उनको ये हमेशा लगता रहा कि अगर दिल्ली में सरकार बदल गई तो पुरानी मुसीबतें फिर आ जाएंगी. केजरीवाल इन्हीं सारी बातों का जिक्र लोगों के बीच करते रहे. लेकिन बीजेपी ने इसका सही जवाब ढूंढने की जगह पूरी तरह से नकारात्मक और सांप्रदायिक राजनीति पर उतर आई. उधर केजरीवाल थे तो हर बात का पहले से ही सधा जवाब रखे हुए थे. यहां तक कि कई बार केंद्र सरकार की ये कहते हुए तारीफ की कि दिल्ली के चारों ओर पेरिफेरल एक्सप्रेसवे बनाकर केंद्र ने हजारों ट्रकों और लॉरियों को दिल्ली के बाहर से रास्ता दे दिया, जिससे प्रदूषण कम हुआ है. मगर लगे हाथ वो अपनी सरकार के काम को भी रख दिया करते थे. साथ में ये भी कि काम किया हो तो वोट देना वरना नहीं देना. बीजेपी जब केजरीवाल पर आक्रामक हुई और आतंकवादी तक कह दिया तो उनका छोटा सा जवाब था- अगर ऐसा है तो जेल में डालिए. बाहर क्यों रखे हैं? मीडिया जब ये कहता कि आप शाहीनबाग क्यों नहीं जाते तो कहते देश के गृह मंत्री अमित शाह जी है और दिल्ली के पुलिस उन्हीं के तहत आती है. लिहाजा जाना तो उनको चाहिए. मुझे आप बेकार में कह रहे हैं. कुल मिलाकर केजरीवाल ने तमाम विवादों, विवादास्पद बयानों और बदजुबानी से खुद को बचाकर रखा. समूचा प्रचार सिर्फ सरकार के काम पर फोकस्ड रखा.
उधर, बीजेपी कोई ऐसा रास्ता नहीं निकाल पाई कि वो दिल्ली के लोगों को ये समझा सके कि केजरीवाल सरकार ने आपके लिये जो किया है वो कोई बड़ा काम नहीं है और हमारे पास ये एक उदाहरण है, जो उनसे कहीं बेहतर है. अगर सत्ता में आए तो दिल्ली को बेहतरी की राह पर और आगे ले जाएंगे. ना कोई राज्य था और ना कोई चेहरा.
दरअसल बीजेपी मोदी सरकार की कामयाबियों के आधार पर दिल्ली पाने के सपने देख रही थी. वह केजरीवाल सरकार को “किसी काम की सरकार नहीं” कहकर सत्ता पाना चाहती थी, लोगों को धर्म के आधार पर वोटों देने के लिए तैयार कर बाजी मारना चाहती थी- मगर दिल्ली के लिये उसके पास कोई रोड मैप नहीं था. कोई सैंपल नहीं था. यह जो नतीजा आया है वह खुद में बीजेपी की लीडरशिप को कई सबक दे रहा है- अगर सुना औऱ समझा जाए तो.
( वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत के एफबी वॉल से )