पत्रकारों का काम स्टोरी करना है, न की ट्विटर पर बैठकर अनर्गल प्रलाप करना..

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किसी भी नागरिक को एक विवादास्पद ट्वीट या फ़ेसबुक पोस्ट के लिए गिरफ़्तार करना निश्चित तौर पर ‘आउट ओफ़ प्रपोर्शन’ रीऐक्शन है- नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का हनन है. जिसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई जानी चाहिए थी और उठाई भी गयी. लेकिन अगर वह ‘नागरिक’ पत्रकार हो तो उस नागरिक की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. मुझे लगता है आज के युग में पत्रकारों ने ट्विटर को दुनिया मान लिया है और उसी मैन्युफ़ैक्चर्ड ‘दुनिया’ में लड़ते भिड़ते लोग पूरे दिन का वक़्त जाया करते रहते हैं. पत्रकारों का काम स्टोरी करना है, न की ट्विटर पर बैठकर अनर्गल प्रलाप करना. एक सच्ची और मज़बूती से रिपोर्ट की गयी कहानी अपने आप ज़मीनी सच्चाई बताती है. किसी पब्लिक इंट्रेस्ट के मुद्दे पर अगर सरकार ज़िम्मेदार है तो अपनी रिपोर्ट के ज़रिए उसे ज़िम्मेदार ठेहराइए, काम करिए, लेकिन उसमें मेहनत लगती है और वक़्त लगता है. जबकि किसी बुरे स्टैंड अप कोमेडियन की तरह न ‘बिलो द बेल्ट’ ट्वीट्स को व्यंग्य के नाम पर जायज़ ठहराना आसान है. रॉयटर के दो पत्रकार अपनी स्टोरी के लिए गिरफ़्तार हुए थे- आम जनता के पक्ष में जोखिम उठाकर की गयी अपनी रिपोर्टिंग के लिए. इसीलिए वह आज दुनिया में साहसिक पत्रकारिता का प्रतीक हैं. उन्होंने अपनी ज़िंदगी ट्विटर पर नहीं बिताई. ट्विटर पर कटाक्ष करने, तीसरे दर्जे के तथाकथित व्यंग और राजनेताओं का मज़ाक़ उड़ाने के लिए हर पार्टी के प्रवक्ता, ‘पूर्व पत्रकारों’ और ख़ाली बैठे पेड ट्रोल्स की पूरी सेना मौजूद है. यह ऐक्टिव पत्रकारों का काम नहीं. उनका काम ज़मीन पर स्टोरी करना और उन कहानियों को संयमित भाषा और बेहतर क्वालिटी में प्रोड़ूस करके लोगों के सामने रखना है.

( प्रियंका दूबे BBC World Service में Bilingual Correspondent हैं )