डॉक्टरों पर जैसे आप तरस खा रहे हैं वो अचरज करने वाला है..

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डॉक्टरों से सवाल पूछे जाने को अगर कोई इसलिए गलत ठहरा रहा है क्योंकि उसे लगता है कि मरीज़ों को देख रहा डॉक्टर व्यवस्था का अंग नहीं है तो मुझे समस्या है। आप नर्सेज़ को छोड़ सकते हैं। वार्ड ब्वॉय को बख्श सकते हैं लेकिन डॉक्टर उतनी गई गुज़री चीज़ नहीं जितनी आप बना कर दिखा रहे हैं। अंजना हों या अजीत अंजुम किसी के साथ राजनीतिक विरोध होना अलग है। हमारे भी हैं एक ही पेशे में रहते हुए हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि जहां ग्रे एरिया हों वहां भी मौका पाकर उनके रगेदने लगें.

ये ठीक है कि मुज़फ्फरपुर जैसे मामलों की कवरेज में आईसीयू का ध्यान रखना चाहिए। शोर ना मचे इसका अतिरिक्त ख्याल रखना चाहिए। रिपोर्टिंग के दौरान काम में ही व्यवधान ना पड़ जाए ये भी खुद से देखना चाहिए लेकिन डॉक्टरों पर जैसे आप तरस खा रहे हैं वो अचरज करने वाला है। ये डॉक्टर उस लंबी श्रृंखला का अंग हैं जो ऊपर व्यवस्थापकों तक जाती है। यही बताते हैं कि कितने बेड कम हैं, कौन सी दवाइयां नहीं हैं, कौन उनके यहां फ्री सुविधा की कालाबाज़ारी कर रहा है। आपने कितने दिन पहले पढ़ा था कि डॉक्टरों ने इसलिए प्रदर्शन किया हो कि वो तो मरीज़ की जान बचाना चाहते थे लेकिन संसाधनों की कमी के चलते नहीं कर सके? इसके उलट वो अपनी सैलरी पर लड़ते हैं, साथ हुई मारपीट के लिए जूझते हैं, निजी परेशानियों को दूर करने के लिए उतरते हैं। मैं इसे गलत नहीं मानता लेकिन जिस व्यवस्था में वो पूरी ज़िंदगी काम करते चले जाते हैं क्या उसकी खामी को दूर करने के लिए कभी इसी तेवर से खुलकर सामने आते हैं?

मैं अलोकप्रिय बात कर रहा हूं। जानता हूं कि जमकर विरोध होगा। सबकी अपनी आपत्तियां हैं। कई लोग वो एंगल देखेंगे ही नहीं जो मैं दिखाने का प्रयास कर रहा हूं क्योंकि हर कोई इधर या उधर खड़ा है, ना कि कहीं बीच के ग्रे एरिया में। ऐसा ही ग्रे एरिया है डॉक्टरों की पिटाई के विरोध में प्रदर्शन का। डॉक्टरों के साथ देशभर में मारपीट होती है, लेकिन उनके बार-बार शिकायत करने पर भी किसी ने नहीं सुनी.. मगर जैसे ही वो अपनी बात सुनाने के लिए बंद बुलाते हैं तब सब उनको कोसने लगते हैं। अगर व्यवस्था ने तय कर लिया है कि डॉक्टर जब तक काम ना ठप्प कर दें तब तक उनकी सुनी नहीं जाएगी तो फिर वो आखिर क्या करेंगे? मैंने चुपचाप देखा। अधिकतर लोग डॉक्टरों के खिलाफ खड़े थे। वजह थी कि लोगों को डॉक्टरों की हड़ताल से सीधा फर्क पड़ता था। वहीं स्थिति बदल गई जब डॉक्टरों से पत्रकार ने सवाल कर लिया। यहां विरोध पत्रकार का होने लगा क्योंकि इस जगह पर लोग डॉक्टर को नहीं जानते थे लेकिन पत्रकार और मीडिया से जले-फुंके थे।

मैं खुद कैसे मान लूं कि आईसीयू में चिल्लाना गलत नहीं है। मैं इससे भी कैसे इनकार करूं कि पत्रकारिता संवेदनहीन होने लगी है। ना खारिज कर सकता हूं कि खबर अगर ज़्यादा चली तो टीआरपी भी आती है लेकिन इनकार आप भी नहीं कर सकते कि अगर आईसीयू में वो हल्ला ना कटा होता तो ऊंघते-स्कोर पूछते नेता-मंत्री-संतरी अभी दिखने नहीं थे। कई दाग अच्छे होते हैं। मुझे मुज़फ्फरपुर वाला दाग अच्छा लगा। हां, अब तमाशा ज़्यादा होने लगा है क्योंकि होड़ मच गई है मगर पहले से सहमे गरीबों के बीमार बच्चे मंडी बने उस आईसीयू में चुपचाप मरते रहते इससे बेहतर ही हुआ कि अधपकी रिपोर्टिंग की वजह से मंत्री और डॉक्टर किसी हद तक जागे उठे। हम और आप बहुत दूर बैठ अब इसका विश्लेषण करने को आज़ाद हैं, जो किया भी जाना चाहिए ताकि भविष्य में सतर्कता और सजगता से काम अंजाम दिया जा सके।

(पत्रकार नितिन ठाकुर के एफबी वॉल से. “नितिन ठाकुर TV9 Bharatvarsh में Assistant Editor हैं.”)